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जानिए क्या है LEO और क्यों अहम है यह सैटेलाइट के लिए

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मल्टीमीडिया डेस्क। भारत ने अंतरिक्ष में मार करने की क्षमता हासिल कर ली है। ऐसा करने वाला भारत चौथा देश है। इससे पहले अंतरिक्ष में किसी सैटेलाइट को मार गिराने की क्षमता सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन के पास थी। यह उपलब्धि इसलिए अहम है क्योंकि इसके जरिये वह किसी दुश्मन देश में बिना खून खराबा किए उसे घुटनों पर ला सकता है। जानते हैं यह क्या है और इसका क्या फायदा है...

लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) या पृथ्वी की निचली कक्षा है, जो धरती की सतह से 2,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित है। अंतरिक्ष में स्पेस स्टेशन के साथ ही कई सारे सैटेलाइट लो अर्थ ऑर्बिट में ही स्थापित किए जाते हैं। लो अर्थ ऑर्बिट में उपग्रह को स्थापित करने के लिए सबसे कम ऊर्जा की जरूरत होती है।

यहां हाई बैंडविड्थ मिलने के साथ ही और कम समय में संचार मुहैया होता है। लिहाजा संचार के लिए, मनोरंजन के लिए और सेना के इस्तेमाल के लिए भेजे गए सैटेलाइट को लियो में ही स्थापित किया जाता है। लियो में उपग्रह और अंतरिक्ष स्टेशन की सर्विसिंग क्रू मेंबर्स के लिए अधिक आसान होती है।

किसी उपग्रह को लियो में रखने के लिए कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है और एक उपग्रह को सफल संचरण के लिए कम शक्तिशाली एम्पलीफायरों की जरूरत होती है। लिहाजा, लियो का इस्तेमाल कई कम्युनिकेशन एप्लीकेशन्स जैसे इरीडियम फोन सिस्टम के लिए किया जाता है। कुछ संचार उपग्रह बहुत अधिक भूस्थिर कक्षाओं में स्थापित किए जाते हैं और पृथ्वी के कोणीय वेग पर चलते हैं, जिससे ग्रह पर एक स्थान के ऊपर स्थिर दिखाई देते हैं।

बताते चलें कि लियो में मानवीय अंतरिक्ष की ऊंचाई का रिकॉर्ड जैमिनी 11 था। 21 से 27 दिसंबर 1968 के बीच अपोलो-8 पहला इंसानी मिशन था, जो 1968 से 1972 के बीच चार साल की अवधि के दौरान चला। इसके लिए 24 अंतरिक्षयात्रियों ने उड़ान भरी थी और इसके बाद कोई भी इंसानी अंतरिक्षयान लियो के आगे नहीं गया है।

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